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devotions
क्या जयवन्त मसीही जीवन सच मे संभव है

किसी को ये सोचने के लिए कई साल से मसीही होने की जरुरत नही है,"क्या सच मे जयवन्त मसीही जीवन जैसे कोई बात है? क्या मेरे पास परमेश्वर की क्षमा और अनंतकाल के उद्धार की ही प्रतिज्ञा है या मै सच मे बूरी आदतों और तरिकों पर विजय का अनुभव कर सकता हूं?" मै सोचता हूं कि अगर हम एक दूसरे के साथ पूरी तरह इमानदार हो जाएं, तो हम पाएगे कि बहुत से विश्वासी यही प्रश्न पूछ रहे हैं - और अच्छे कारण के लिए ही.

हमें हमारे आस-पास देखना होगा कि बहुत से विश्वासी उस विजय से बहुत नीचे जी रहे हैं जिसके बारे मे नए नियम मे बताया गया है. मै अकसर ऐसे लोगों से मिला हूं जिन्हें इतनी समस्याएं और परेशानीयां हैं, जिसके बारे मे मैने सोचा कि इस परिस्थिती का कोई हल नही हो सकता है. फिर मैने आस-पास देखा, यहां तक कि बहुत से मसीही अगुवों मे और पूरे मसीही समाज मे भी मैने हार, निराशा और परेशानी देखी. मसीही समाज के लिए हार इतनी सामान्य हो गई है कि बहुत से लोगों ने विजय के बारे मे बाइबल के सिद्धान्त ही छोड दिए और बाइबल के बजाएं मनोविज्ञान के और मानवी सिद्धान्तों की ओर फिर गएं. पिछले कुछ ही सालों मे सलाह देने के लिए नई इंडस्ट्री शुरु हुई है क्योंकि मसीही समाज मे बहुत हार है. परिणाम स्वरुप, स्वाभाविक मनोदशा यही है कि क्या विजय सच मे है इस पर सवाल करें.

हमारे आस-पास के विश्वासियों की हार देखने से बहुत बुरा है कि हम खुद की हार देखें. बहुत से विश्वासी खुद को बंधे हुए पाते हैं, अभिलाषा, कडवाहत, क्रोध, चिन्ता और दिल की दूसरी समस्याएं जिनके बारे मे उन्होंने सोचा था कि विश्वासी होने के बाद उन्हें उनका कभी सामना नही करना पडेगा. हम मे से बहुत से लोगों को बताने की भी जरुरत नही है कि हम हारे हुए हैं. हम हररोज़ इस वास्तविकता का सामना करते हैं. हालही मे एक बहन ने हिचखिचाते हुए मुझे बताया कि वो दूसरी स्त्री के पती के साथ गलत संबंध मे जुडी हैं. जिस तरह से उसने अपने पाप का अंगिकार किया वो मुझे दर्शा रहा था कि उस संबंध पर विजय पाने की कोई आशा नही है. कई साल पहले मेरी मुलाकात ऐसे पास्टर से हुई थी जिन्हें अनैतिक संबंध की समस्या थी. उन्होंने कहा,"मैने प्रभु से प्रार्थना कर कहा था कि मुझे इस महसुसीकरण से छुडाएं, जो मै उस स्त्री के लिए रखता हूं, लेकिन प्रभु ने नही छुडाया, इसलिए मैने ये संबंध स्वीकार किया और शायद प्रभु भी मुझ से यही चाहता हो." बहुत से विश्वासीयों ने विश्वासीयों की मंज़िल के रुप मे हार को स्वीकार कर लिया है. क्योंकि वो अपने जीवन मे स्रोत को पकडकर विजय का मार्ग नही अपना सकते हैं.

मैने अकसर सुना है कि विश्वासी अपने मसीही जीवन मे विजय की कमी के लिए बहाना बनाने के लिए वचन भी कहते हैं. खासकर राजा दाऊद, जिसकी असफलता के लिए कहा जाता है. ऐसे कारण बताते हैं,"खैर कुछ भी हो वो तो परमेश्वर के दिल का सा व्यक्ति था, लेकिन फिर भी उस ने अभिलाषा, व्याभिचार और हत्या की थी. अगर वो परमेश्वर का जन था और परमेश्वर के राज्य का अगुवा था, तो फिर हम से उससे बेहतर करने की आशा क्यों की जाती है?" बाइबल निश्चित ही ऐसे उदाहरणों से भरी है जिसमे भक्तिपुर्ण लोग हार गएं थे. प्रेरित पौलुस कहता है,"क्योंकि मै जो भले काम करना चाहता हूं, उसे नही कर पाता हूं, लेकिन वही काम करता हूं जो मै नही करना चाहता हूं." (रोमियों ७:१९)

पतरस ने यीशु का इनकार किया तो थोमा ने उस पर शक किया था,जब राजा ने इब्राहिम की पत्नी मांगी तब इब्राहिम कायर हो गया. मूसा फिरोन के डर के मारे मिद्दानियों के रेगिस्तान मे चला गया. बाइबल मे अगर हम जल्दी से देखे तो कोई भी ये सोच सकता है कि विश्वासीयों के लिए विजय है ही नही.

लेकिन एक और कारण है जिसकी वजह से मसीह के बहुत से अनुयासी हार के गटर मे पडे हैं. वे जानते हैं कि वो जिस जगह हैं वो बदबुदार है. वे जानते हैं कि बाइबल अलग तरह के जीवन के बारे मे कहती है, बहुत से लोग पाप की जुग्गीयों से निकल चुके हैं लेकिन आत्मिक मंज़िल मे गंदगी मे ही रहने को स्वीकार किया है. बहुत से लोग ये नही समझते हैं कि एक बुरा मालिक है जो उन्हें सहमत करता है कि उन्हें जुग्गीयों मे ही रहना चाहिए. उन्होंने शैतान के झुठ पर विश्वास किया है, वो मनुष्य की सृष्टि से वही पुरानी कहानी बता रहा है. वो विश्वासीयों की हर पीढी को सहमत करना चाहता है कि उन्हें पाप की जुग्गीयों मे ही रहने के लिए निशिचत किया गया है और ये आत्मिक गटर उनके मसीही जीवन का एक भाग है.

हमारी खुद की शक्ति और सामर्थ मे विजयी जीवन जीना पूरी तरह से असंभव है. खुद पर आधारित रहने पर हम हमेशा हारे हुए ही रहेगे. लेकिन मसीही के सच्चे अनुयायीयों के लिए एक अच्छी खबर है. यीशु ने कहा,"जो मनुष्य के लिए असंभव है वो परमेश्वर के लिए संभव है" (लूका १८:२७). हमारा परमेश्वर असंभवता मे बहुत ही माहिर है. उसने हमारी विजय के लिए पूरा प्रयोजन किया है. विजयी मसीही जीवन विश्वासी के लिए केवल एक सपना या असाध्य ईच्छा नही है. ये वर्तमान की वास्तविकता है. ये ऐसा नही जिसे पाया जा सकता है लेकिन मसीह के द्वारा इसे पाया जा चुका है.

यीशु जब क्रुस पर मरा तब उसने हमारे हर एक शत्रु को हरा दिया. उससे भी अधिक उसने शैतान को हरा दिया. शैतान को भाईयों पर दोष लगानेवाला कहा जाता है. वो हमेशा हमसे कहता है कि कोई आशा नही है. वो हमें सहमत करता है कि हार ही हमारी मंज़िल है. लेकिन वो झुठा है. वचन हमें स्पष्ट बताता है, "परन्तु इन सब बातों मे हम उसके द्वारा जिसने हम से प्रेम किया है, जयवन्त से भी बढकर हैं" (रोमियों ८:३७). बाइबल कहती है कि जब यीशु क्रुस पर मरा तब उसने शैतान की हार का खुल्लम खुल्ला तमाशा बनाया (कुलुस्सियों २:१५). हमें अब शैतान के झुठ पर विश्वास करने की जरुरत नही है. स्वर्गिय स्थानों मे आत्मिक आत्मिक शक्तियों पर पहले से ही विजय प्राप्त कर ली गई है. ये सच्चाई है.

शायद सबसे बडी परेशानी जिसका हम सामना करते हैं वो हमारे अंदर ही है. रोमियों अध्याय ७ मे प्रेरित पौलुस प्राथमिक रुप मे इसे से लढता है. वो विजय चाहता था, लेकिन उसने अंगिकार किया कि उसके शरीर मे कोई भली बात वास नही करती है (रोमियों ७:१८). उसने ये प्रश्न भी पूछा,"कौन मुझे मृत्यु की इस देह से छुडाएगा" (रोमियो ७:२४)? बाद मे वो मज़बुती से खुद के प्रश्न का उत्तर देता है," हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद हो"(रोमियो७:२५). हां, पौलुस ने हार का अनुभव किया था. लेकिन वो ये भी जानता था कि विजय का स्रोत मसीह मे पाया जाता है.

विश्वासी होने के बाद शायद मैने सबसे बडी सच्चाई यही सिखी है. विजयी मसीही जीवन ऐसा नही है जिसे मै प्राप्त कर सकता हूं. मसीह ने ये मेरे लिए प्राप्त कर लिया है. ये वो नही है जो मै उसके लिए कर सकता हूं, लेकिन वो है जो उसने मेरे लिए पहले से ही कर दिया है. ये "मै" नही हूं, लेकिन "मसीह मुझ मे है" यही विजय की महान आशा है. उस पर भरोसा रखना मेरी जिम्मेदारी है, जैसे मैने यीशु पर भरोसा किया कि वो मुझे उद्धार दे और माफ करें, मै उस पर भरोसा कर सकता हुं कि जिन बुरी ईच्छाओं से मेरी परीक्षा होती है उस पर मुझे विजय दे. हां, विजयी मसीही जीवन संभव है. ये पाया जा सकता है क्योंकि यीशु ने विजय पाई है. हमें बस उस पर भरोसा रखना है.