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devotions
विश्वास और विजय

मसीह की ओर से हारनेवाला होने की जरुरत नही है. अमीर से लेकर गरिब तक, बुढे से लेकर जवान तक, पढे लिखे से लेकर अनपड तक, हम सब के पास विजय का वही स्रोत है. ये हमारी भौतिक वस्तुएं नही, हमारा स्वाभाविक ज्ञान नही, ना ही हमारे पास की संपत्ति है. मसीह ने हमारे लिए पहले से ही जो किया है उसके कारण विजय हम सब के लिए उपलब्ध है. ये उसकी विजय है, और विजय केवल विश्वास के द्वारा ही पाई जा सकती है.

यदि हम विश्वास के महान वीरों के बारे मे पढें, बाइबल के समय और आधुनिक समय याने दोनों समय मे हम पाते हैं कि उन मे से हरएक की विजय विश्वास के द्वारा आयी. हाबील ने विश्वास से आराधना की. नूह ने विश्वास से काम किया. हनोक विश्वास से चला. इब्राहिम ने विश्वास से यात्रा की. मूसा ने विश्वास से देश को आज़ाद किया. दाऊद ने विश्वास से ही दानव को मारा. पौलूस ने विश्वास के द्वारा ही सुसमाचार प्रचार किया. लुथर ने विश्वास के द्वारा ही क्रान्ति लायी. वाईट फिल्ड ने विश्वास से ही जागृति का अनुभव किया था. मोडी ने विश्वास से ही पूरे महा-द्विप को हिला दिया. विश्वास से ही हमेशा विजय पाई गई और आनेवाले समय मे भी पाई जाएगी. हमारी व्यक्तिगत विजय के लिए मुख्य बात यहां पर तो केवल हमारे विश्वास ही की है.

इसलिए ये जरुरी है कि हम विश्वास का स्वभाव जान ले. क्या विश्वास वो अजिबसा महसुसीकरण है जो हम उत्तम वक्ता को सुनने पर महसुस करते हैं? या विश्वास मन की सायकॉलॉजीकल दशा है जिसे सकारात्मक सोच के द्वारा प्राप्त करते हैं? क्या विश्वास सारी समस्याओं के लिए हल है? क्या हम इसका नाम लेकर दावा कर सकते हैं? क्या विश्वासीयों के लिए क्या ये संभव है कि जैसे कई लोग दावा करते है, वैसे कभी बीमार न हो? विश्वास क्या है और वो कहां से आता है? इस प्रश्न का उत्तर ही विजयी मसीही जीवन का भेद है. खैर कुछ भी हो, मै डरता हूं कि हम ने विश्वास के बारे मे बाइबल की शिक्षा को नाश किया है, और हमे एक और क्रान्ति की जरुरत है जो हमारे प्राण को विजय के लिए जागृत करे और फिर से एक बार चर्च को जगत की ज्योति होने दे.

विश्वास परमेश्वर से शुरु होता है, हम से नही. विश्वास वो नही जब हम खुद के मन को भरोसे की दशा मे लाते है. ये अजीबसा महसुसीकरण नही है. बाइबल कहती है,"विश्वास सुनने और मसीह के वचन सुनने से आता है." विश्वास हम से शुरु नही होता है. वो परमेश्वर से शुरु होता है. विश्वास के बिना परमेश्वर को प्रसन्न करना अनहोना है, लेकिन परमेश्वर के बिना विश्वास पाना भी अनहोना है. विश्वास एक पदार्थ है. ये हमारे बाहर के स्रोत से शुरु होता है. ये परमेश्वर के कहने से शुरु होता है. ये परमेश्वर के वचन से शुरु होता है. ये हमारे दिल की शाश्वति है जो परमेश्वर के वचन के सुनने के द्वारा उत्पन्न होती है.

जब परमेश्वर हमारे दिल से अपने वचन कहता है तब विश्वास शुरु होता है. फिर वो मसीह यीशु के द्वारा फिर से परमेश्वर की ओर ही होता है. बाइबल का असली विश्वास हमेशा यीशु की ओर ही होता है. इब्रानियों १२:२ कहता है," हमारे विश्वास के कर्ता और सिद्धकर्ता यीशु की ओर देखे." यीशु ही हमारा विश्वास शुरु करनेवाला और उसकी देखभाल करनेवाला है. वो ही, "मार्ग, सत्य और जीवन है." यूहन्ना के सुसमाचार मे यीशु को परमेश्वर का वचन कहा गया है. इसलिए जो विश्वास उससे शुरु होकर उसमे बना नही रहता है, वो सच्चा विश्वास नही है.

बहुत से विश्वासी खुद को हारा हुआ पाते हैं क्योंकि उन्होंने केवल मसीह के बजाय खुद पर, अपनी योग्यता पर, अपने धन पर या यहां तक कि अपने अनुभव पर भरोसा किया है. अकसर परमेश्वर को हमारे अंदर अयोग्यता दर्शानी पडती है ताकि वो अपनी योग्यता प्रकट कर सकें. शायद वो हमारा धन दूर कर दे ताकि मसीह के महिमामय धन के द्वारा वो हमारी हर जरुरत पूरी कर सकें (फिलिप्पियों ४:१९). हमारा अनुभव धोका देनेवाला हो सकता है लेकिन यीशु ही एक मात्र सच्चाई है. विजय यीशु पर और केवल यीशु पर भरोसा करने से आती है.

जब परमेश्वर हमारे दिल से अपने वचन कहता है तब विश्वास शुरु होता है और हमारी हर जरुरत पूरी करने के लिए यीशु की ओर देखते रहने से बना रहता है. लेकिन अंत मे विश्वास काम करता है. हमारे काम विश्वास उत्पन्न नही करते है, लेकिन इसका उलटा ही सच है. विश्वास काम उत्पन्न करता है - हमारे जीवन मे परमेश्वर का काम. इसलिए हम अपनी योग्यता, स्रोत और उपलब्धी पर घमण्ड नही कर सकते हैं. हम केवल मसीह में घमण्ड कर सकते हैं. वही हमारी विजय और उपलब्धी का एक मात्र स्रोत है. यदि हम सच मे मसीह पर भरोसा करते हैं, तो हम उसकी विजय को जानेगे.

कई बार मुझे इस वाक्य के कारण चुनौति मिलती है, लोग मुझ से कहते हैं,"सैमी, मैने मसीह पर भरोसा किया लेकिन उससे मेरी कोई मदत नही हुई." जैसे मै ये साबित करके दिखाता हूं और पाता हुं कि उनका भरोसा मसीह की सामर्थ और परिपूर्णता के बजाए उनके अपने अनुभव और महारत पर अधिक था. मसीह के साथ इस यात्रा मे मुझे अब ३० साल से भी ज्यादा समय हो चुका है, और एक बात मै पूरी कायलता के साथ कह सकता हूं - "मैने यीशु को कई बार असफल किया है लेकिन उसने मुझे एक बार भी असफल नही किया." मैने ये महान सच्चाई खोज निकाली - मसीही जीवन मे विजय केवल विश्वास से ही आती है. यीशु के द्वारा याने परमेश्वर के वचन के द्वारा परमेश्वर ने हम से जो कहा है उसे थामें रहने के द्वारा विश्वास शुरु होता है. ये यीशु की ओर देखने के द्वारा निरंतर बना रहता है, और ये विजय के साथ खत्म होता है - जो हमारी नही लेकिन उसकी है. हम केवल उस विजय मे प्रवेश करते हैं जो उसने जीती है. ऐसा नही था कि नूह, इब्राहिम, मूसा, दाऊद, पौलूस, लूथर और वाईट फिल्ड बहुत महान थे. ये बस इतना ही था कि उन्होंने महान और सामर्थी परमेश्वर पर भरोसा रखा था. उन्होंने यीशु की ओर देखा. इस बात पर सोचना बहुत ही अदभुत होगा कि नूह, इब्राहिम, मूसा, दाऊद, पौलूस, लूथर और मोडी का परमेश्वर हमारा परमेश्वर है. हमारी योग्यता हमें विजय नही देगी, लेकिन सामर्थी परमेश्वर पर सरल विश्वास विजय देता है.