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devotions
संदेह से निपटना

मुझसे अक्सर यह पूछा जाता है, “क्या कभी आपके मन में परमेश्वर के बारे में संदेह आते हैं?” अधिकतर लोग यह सुनकर हैरान रह जाते हैं कि एक मसीही लेखक, अन्तर्राष्ट्रीय सुसमाचार प्रचारक और 33 वर्षों से मसीह का अनुयायी अभी भी संदेहों से जूझता है। परन्तु यह सच है। मैंने बहुत समय पहले सीखा था कि अपने विश्वाधस पर संदेह करना बुरा नहीं है। परन्तु संदेहों पर विश्वाेस करना पाप है।

मेरे मसीही जीवन के प्रारम्भिक दिनों में मैंने अक्सर अपने आप को संदेह करते हुए पाया। मैं कुछ न कुछ ऐसा कर बैठता था जिसके बारे में मैं जानता था कि परमेश्वर इससे प्रसन्न नहीं होगा, और फिर मन में ऐसे-ऐसे प्रश्न आते जो मुझे मेरे किए हुए पाप का स्मरण दिलाते रहते, “तुम मसीही होने का दावा करके ऐसा कैसे कर सकते हो? यदि कोई परमेश्वर है तो फिर ऐसा क्यों होता है?”

मसीह में आने के कुछ दिन बाद, मैं अपने कमरे में रो-रोकर परमेश्वर को पुकारने लगा। मेरा मन संदेहों से भरा हुआ था। “क्या कोई परमेश्वर है? कहीं मुझे भरमाया तो नहीं गया है? क्या यह मात्र भावुक अनुभव था?” मैंने अपने आप को बहुत उलझन में महसूस किया। मैंने परमेश्वर को पुकारा। ऐसा लगा कि उन क्षणों में कहने के लिए मेरे पास केवल यही शब्द थे, “यीशु, हे यीशु, मेरी सहायता कीजिए!” कुछ देर तक परमेश्वर को पुकारने के बाद शान्ति ने एक नदी के समान मेरे हृदय को भर दिया। पवित्र आत्मा ने मेरी आत्मा के साथ मिलकर यह साक्षी दी कि मैं परमेश्वर की सन्तान हूँ। अब मैं जान गया था कि मसीह वास्तव में है। यह भावना से गहरी और मानवीय समझ से बड़ी बात थी। यह आत्मिक ज्ञान था।

मसीही जीवन एक यात्रा के समान है। चलते हुए नई-नई बातें आपके सामने आती हैं। आप निरन्तर सीखते और बढ़ते रहते हैं। जो व्यक्ति नहीं बढ़ता वह अन्त में हमेशा पराजित होता है। मसीही जीवन के बारे में जो अधिकतर बड़े प्रकाशन मुझे मिले वे संदेहों से जूझते हुए मिले। मैंने सीखा कि मैं अपने संदेहों को मुझे निराशा की गहराईयों में नहीं गिराने दूँगा बल्कि इनका प्रयोग विश्वास की नई ऊँचाइयों तक पहुँचने के लिए करूँगा। मैंने संदेहों के स्रोत को पहचानना भी सीखा। मसीह को जानने से पहले मेरे संदेहों के स्रोत गहरे थे। यह आत्मिकता से सम्बन्धित थे। इनकी गहराई मेरे अस्तित्व के केन्द्र तक थी। मेरे अन्दर संदेह इस लिए था क्योंकि परमेश्वर के साथ मेरा कोई अत्यावशयक सम्बन्ध नहीं था। मेरे पास परमेश्वर का निश्चेय नहीं था क्योंकि मुझे परमेश्वर का कोई ज्ञान नहीं था। परमेश्वर आत्मा है। मेरे जीवन में उसके आत्मा की उपस्थिति नहीं थी। परन्तु विश्वाथसी बनने के बाद मैंने जिन संदेहों का अनुभव किया वह केवल छिछले थे। मनुष्य का सबसे भीतरी भाग उसकी आत्मा है। अब मेरे संदेह मेरी आत्मा से नहीं होते क्योंकि “उसका आत्मा मेरी आत्मा के साथ मिलकर साक्षी देता है कि मैं परमेश्वर की सन्तान हूँ” (रोमियों 8:16)। दूसरे शब्दों में मैं अपने अस्तित्व की गहराई से यह जानता हूँ कि मैं परमेश्वर की सन्तान हूँ क्योंकि मेरे हृदय के गहनतम भाग में पवित्र आत्मा निवास करता है।

वह निरन्तर मुझे बताता है कि मैं परमेश्वर की सन्तान हूँ, और यह कि मसीह का लहू मुझे मेरे सब पापों से शुद्ध करने के लिए पर्याप्त है। यह मात्र बाइबल में दर्ज एक सच्चाई नहीं है परन्तु यह वास्तविकता है। हालेलुयाह! परमेश्वर का आत्मा मेरे अन्दर गहराई में वास करता है और निरन्तर मुझे बताता है कि मैं यीशु का हूँ और वह मेरा है! मुझे बस इतना पता है कि मैं जानता हूँ कि मैं यह जानता हूँ। यह मेरे हृदय की गहराई में है और मैं बस जानता हूँ। यह कोई दिमागी ज्ञान या कोई भावुक एहसास नहीं है। यह आत्मिक है। यह मेरे जीवन में उसकी उपस्थिति है।

तो फिर, संदेहों का क्या? यह कहाँ से आते हैं? यद्यपि मेरे पास यह गहरा निश्चहय है कि यीशु मेरा है, परन्तु फिर भी मुझे इन छिछले संदेहों के साथ जूझना पड़ता है। इन संदेहों का सम्बन्ध मेरे जीवन के बौद्धिक और भावात्मक जैसे क्षेत्रों से है। उदाहरण के लिए, जब भी मैं परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करता हूँ तो यह मेरे अन्तरात्मा पर हमेशा एक बौद्धिक या भावात्मक निशान छोड़ जाता है। मेरे मन में यह प्रश्न उठने लगता है कि क्या मैं सचमुच परमेश्वर की सन्तान हूँ। यद्यपि मैं अपने हृदय की गहराई से यह जानता हूँ कि क्रूस पर मसीह की मृत्यु मेरी क्षमा के लिए पर्याप्त है, तौभी मेरे तर्क अक्सर एक निशान छोड़ जाते हैं। मैं अपने दिमाग में यह संदेह करने लगता हूँ कि क्या मैं परमेश्वर की सन्तान हूँ भी। फिर मैं भावात्मक रूप से पराजित महसूस करने लगता हूँ और मुझे संदेह होने लगता है कि क्या मुझे सचमुच अनन्त जीवन मिला है! जब मैं पाप का अंगीकार करके हृदय से पश्चाताप करता हूँ तब मुझे मसीह की मुक्ति के निश्चिय में आराम मिलता है। संदेह मात्र छिछले थे। इसलिए वे अस्थाई थे।

बौद्धिक संदेह आम तौर पर परमेश्वर के विषय में गलत धारणा की उपज होते हैं, जबकि भावात्मक संदेह अक्सर गलत कामों या गलत व्यवहार के कारण उत्पन्न होते हैं। परमेश्वर और हमारे विषय में बाइबल जो कहती है उस पर विश्वा्स करने के बजाय, अक्सर हम उस पर विश्वाास करते हैं जो हमारी संस्कृति हमें परमेश्वर के बारे में सिखाती है। परिणामस्वरूप, हम पराजित हो जाते हैं। मसीह में जो भी विजय हमें मिलती है वह विश्वारस के द्वारा ही मिलती है। एक मसीही के जीवन में विश्वासस वह नींव है जिस पर विजय का निर्माण होता है। परन्तु विश्वावस की नींव का निर्माण परमेश्वर के वचन की सच्चाई के अतिरिक्त और किसी चीज़ पर नहीं हो सकता। यदि हमें वास्तव में संदेहों पर विजय प्राप्त करनी है तो हमें बाइबल की प्रतिज्ञाओं पर खड़े रहना अनिवार्य है।

बौद्धिक संदेह परमेश्वर के वचन के ज्ञान के अभाव के कारण उत्पन्न होते हैं परन्तु भावात्मक संदेह अक्सर परमेश्वर के वचन की अवहेलना के कारण आते हैं। मसीह में विश्वातस के द्वारा हम परमेश्वर के साथ एक सम्बन्ध में प्रवेश करते हैं। हम उसकी सन्तान बन जाते हैं। परन्तु जब हम पाप को अपने जीवन में प्रवेश करने देते हैं तो परमेश्वर के साथ हमारी घनिष्ठता टूट जाती है। अब हम उसके प्रेम की गहराई, चौड़ाई, लंबाई और ऊँचाई को वास्तविक रूप में अनुभव नहीं कर पाते। हमारे प्रति उसके प्रेम में कोई बदलाव नहीं आता। हम अभी भी उसकी सन्तान बने रहते हैं, परन्तु उसके साथ हमारी संगति छिन्न-भिन्न हो जाती है। इस संगति की पुनर्स्थापना केवल तभी हो सकती है जब हम अपने पापों का अंगीकार करके पश्चाताप कर लेते हैं। परम पवित्र परमेश्वर के साथ हमारी घनिष्ठता केवल तभी बनी रहती है जब हम पवित्रता में बने रहते हैं।

जब हम उस पर विश्वापस करते हैं जो परमेश्वर हमारे विषय में कहता है और उन महान सत्यों पर चलते और जीते हैं तो हम अनुभव के द्वारा यह जान जाते हैं कि हम उसकी सन्तान हैं और संदेह नदारद हो जाते हैं। विश्वा्स बढ़ने लगेगा और हम केवल विजय की ही कामना करेंगे। हमें पता चलेगा कि विजयी होने का अर्थ क्या होता है।