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devotions
प्रार्थना और विजय

प्रार्थना का जीवन और विजयी मसीही जीवन के बीच इनकार न किया जानेवाला संबंध है. अगर कोई चर्च के इतिहास के बारे मे देखे तो वो पाएगे कि विश्वास के महावीर प्रार्थना करनेवाले स्त्री और पुरुष थे. अगर हम नए नियम के चर्च की ओर वापस जाए, तो हम पाएगे कि एक छोटा समूह जिसमे मछुवारे, चूंगी लेनेवाले, कर्जदार, सामान्य यहूदी लोग जो यीशु के अनुयायी थे, उन्होंने रोमी शासन को उथल-पुथल कर दिया. उन्होंन संसार को हिला दिया क्योंकि वो परमेश्चर की उपस्थिती मे शान्त खडे रहे. वो प्रार्थना के लोग थे. ये प्रेरितों के काम के चर्च की एक महान खासीयत थी.

लेकिन इतना ही नही की हालही का या इतिहास का चर्च और पहली शताब्दी के विश्वासीयों ने प्रार्थना के द्वारा विजय पाई. लेकिन यहां तक कि प्राचीन इब्रानी अगुवे भी अपनी प्रार्थना या प्रार्थना के जीवन की कमी के कारण ही उठे या गिरे. इसके लिए एक महान उदाहरण है उज्जियाह. जब वो राजा बना तब वो केवल १६ साल का ही था (२ इतिहास २६:१). कैसे एक नौजवान देश की जिम्मेदारीयों को संभाल सकता है? वो पूरी तरह से जिम्मेदार था, यहूदा की अर्थव्यवस्था, यातायात, गृहनिर्माण और दूसरी चिज़ों के लिए. ऐसे जवान व्यक्ति के लिए ये तो असंभव सा दिखाई देता था.

खैर, उज्जियाह बुद्धिमान था. वो एक महान सच्चाई जानता था जो उसे एक सफल अगुवा बनाने के लिए काफी थी. एक जवान व्यक्ति के रुप मे वो ज्यादा नही जानता था, लेकिन वो उस एक को जानता था जो सारे ज्ञान का स्रोत था. इसलिए उसने खुद को परमेश्वर की दया और अनुग्रह के लिए दे दिया. बाइबल कहती है,"जर्कयाह के दिनों मे उसने परमेश्वर को खोजा, जिसने उसे परमेश्वर के भय मे समझ दी. जब तक उसने परमेश्वर को खोजा, परमेश्वर ने उसे सफलता दी" (२ इतिहास २६:५). उसकी विजय उसने नम्र होने पर आधारित थी. वो जानता था कि उस मे लोगों की अगुवाई करने की शक्ति नही थी, लेकिन वो जानता था कि परमेश्वर के साथ कुछ भी असंभव नही है.

खैर जैसे उज्जियाह ने विजय का अनुभव किया उसे कुछ हुआ. ये धिरे-धिरे हुआ लेकिन ये बहुत ही खतरनाक था. बाइबल बताती है कि उज्जियाह किस तरह से हार गया. "लेकिन जब उज्जियाह सामर्थ हुआ, उसका घमण्ड उसे पतन की ओर ले आया....” जब उज्जियाह जवान था और कुछ नही जानता था, उसे पूरी तरह से परमेश्वर पर आधारित रहना था. उसके बाद, जब वो बलवान हुआ, उसे प्रार्थना करने की जरुरत नही थी. उसने सोचा कि राज कैसे चलाएं ये वो जानता है, और उसका घमण्ड उसे हार की ओर ले आया.

उज्जियाह का अनुभव असामान्य नही है, मैने जाना है कि मेरे जीवन के सबसे खतरनाक समय के बाद ही मुझे विजय मिली है. जिससे मै महसुस कर पाता हूं "मैने इसे नियंत्रण मे कर लिया है." सच्चाई ये है कि वो मेरे नियंत्रण मे नही है, लेकिन वो परमेश्वर के नियंत्रण मे है और मेरे लिए अच्छा है कि जो भी मै करता हूं उसमे मै निरंतर उसे और उसकी अगुवाई खोजू. प्रार्थना नम्र दिल का बाहरी प्रगटीकरण है. प्रार्थना कहती है,"हे परमेश्वर,मुझे तेरी जरुरत है. तेरे बिना मै कुछ नही कर सकता हूं." इसके बजाएं प्रार्थना न करनेवाला जीवन कहता है,"मै इसे अपनी शक्ति मे कर सकता हूं. मै जानता हूं कि इसे कैसे करें. मै पहले कई बार सफल हो चुका हूं. मै इसे खुद कर सकता हूं.”

अकसर जब हम प्रभु मे नए होते हैं, हमें परमेश्वर की जरुरत है इसके बारे में हम सचेत होते हैं. हम उस पर आधारित होते हैं और वो हमें विजय देता है. हम प्रार्थना मे परमेश्वर को खोजते हैं. जैसे हिरनी पानी की चाह रखती है वैसे ही हमारा दिल प्रभु की चाह रखता है. हम भुखे और प्यासे होते हैं कि हम विजय जाने और उस मे चले. लेकिन विजय पाने के बाद, हम सोचना शुरु करते हैं कि हम मसीही जीवन अपनी ही शक्ति मे जी सकते हैं. एक बार जब ऐसी मनोदशा हमारे दिल मे रेंगती हुई आती है, हम निश्चय ही गिरने की ओर आगे बढ रहे हैं, बिलकुल वैसे ही जैसे उज्जियाह गिरा था, वैसे ही हम भी गिरेगे.

इसलिए प्रार्थना हमारे लिए बहुत ही महत्वपुर्ण है. ये कोई ऐसी धार्मिक क्रिया नही है, जिसे करने की प्रभु हम से अपेक्षा करता है. ये परमेश्वर को दिल से पुकारना है,"मुझे तेरी जरुरत है!" प्रार्थना तो सृष्टिकर्ता और जगत को संभालनेवाले के साथ सहभागी होने के लिए समय अलग निकालना है. ये हमारे छुडानेवाले के बारे मे अदभुत ज्ञान प्राप्त करने के लिए दिल की तीव्र इच्छा है. प्रार्थना परमेश्वर को जानना है. उस ज्ञान के बाहर कोई विजय नही है. लेकिन मै सहमत हूं "जब तक हम प्रभु को खोजते रहेगे, परमेश्वर हमें सफलता देगा." उसने ये उज्जियाह के साथ किया था. उसने नए नियम के चर्च के साथ ऐसा किया था. शतकों से उसने ऐसा विश्वास के महान स्त्री और पुरुषों के साथ किया था. और वो यही हमारे लिए करेगा. वो नही बदला है और उसके मार्ग नही बदले हैं.