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devotions
परमेश्वर का वचन हमारे दिल मे लेना

भजनकार ने सफल मसीही जीवन का भेद प्रकट किया जब उसने लिखा,"मैने तेरे वचन अपने हृदय रखें हैं ताकि मै तेरे विरोध मे पाप न करुं" (भजन ११९:११). यीशु ने इसी कायलता को प्रकट किया जब उसने कहा, "मनुष्य केवल रोटी ही से नही, लेकिन परमेश्वर के मूंह से निकलनेवाले हर वचन से जीवित रहता है" (मत्ती ४:४). हम में से हरएक के अंदर एक भीतरी भुख है जो जीवन की रोटी के लिए पुकारती है (यूहन्ना ६:३५). जब हम हमारे दिल के लिए परमेश्वर के सबसे गहरे प्रयोजन को लेते हैं तब ही वो भुख और प्यास पूरी की जा सकती है. यदि हम मसीह के साथ चलते हुए प्रतिदिन विजय का अनुभव करना चाहते हैं तो हमें परमेश्वर का वचन हमारे जीवन मे लेना ही होगा.

लेकिन व्यवहारिक रुप मे हम इसे कैसे कर सकते हैं? मसीह के साथ कई साल तक चलते हुए, मैने परमेश्वर का वचन हमारे जीवन मे लेने के पांच तरीके सिखे हैं. पहला है, हमें परमेश्वर का वचन पढना होगा. यीशु ने कहा,"तुम तो उस वचन के कारण जो मैने तुम से कहा है, शुद्ध हो (यूहन्ना १५:३). जैसे हम परमेश्वर का वचन पढते हैं, परमेश्वर का वचन हमारे जीवन मे शुद्धिकरण का काम करता है. ये जरुरी है कि हम परमेश्वर का वचन सही तरिके से, हमेशा और समर्पण के साथ पढे. जैसे हम इसे क्रमबद्ध रुप मे पढते हैं, हम परमेश्वर का स्वभाव देखना शुरु करेगे. हम खोज निकालेगे कि उसके दिल मे क्या है. हम सिखेंगे कि वो कौन है और वो कैसे काम करता है.

लेकिन हमें उसे प्रतिदिन पढना होगा. यदि हम रोज शारीरिक भोजन न करे तो हम नही जी पाएगे. तो फिर हम किस कारण ये सोचते हैं कि अगर हम प्रतिदिन परमेश्वर का आत्मिक भोजन न करें तो भी हम आत्मिक रुप मे जी पाएगे? लेकिन साथ ही हमे समर्पण के रुप मे प्रतिदिन बाइबल पढनी चाहिए. इसका अर्थ है कि परमेश्वर के वचन पर मनन करने के द्वारा हम परमेश्वर का वचन अपने जीवन मे लेते हैं. जैसे हम वचन पढते हैं, हमें उस पर सोचना चाहिए. बाइबल को और किसी सामान्य किताब जैसे नही पढा जा सकता है. बाइबल परमेश्वर का वचन है. इसी के द्वारा परमेश्वर हमारे दिल से बातें करता है. इसलिए हम ने जो पढा है, उस अपने मन, भावना और क्रिया मे प्रकट करने के लिए समय देना चाहिए. हम ने क्या पढा है उस पर हमें सोचना चाहिए और फिर उसे जीवन मे लागू करना चाहिए. यदि हम वचन पढने के द्वारा अपने जीवन की शुरुवात करते हैं तो ये बहुत मददगार होता है. और फिर जैसे हम गाडी चलाते, चलते है, काम करते हैं या पढाई करते हैं, हम मनन कर सकते हैं कि प्रभु ने हम से क्या कहा है.

हमारे जीवन मे परमेश्वर का वचन लेने का तीसरा तरिका है परमेश्वर का वचन सुनना. पौलूस ने लिखा,"विश्वाश संदेश सुनने से आता है, और मसीह के वचन का संदेश सुनने से आता है"(रोमियों १०:१७). ये अदभुत वाक्य है. क्या आपने कभी सोचा है कि आप अपना विश्वास कैसे बढा सकते हैं, या अपने विश्वास मे बढ सकते हैं? पौलुस स्पष्ट कहता है कि ऐसी उन्नति केवल मसीह के वचन सुनने से आती है.

कई साल पहले जब मै पेरू के दो शहरों मे प्रचार कर रहा था. पहले शहर मे स्पोर्टस अरीना लगभग एक तीहाई भरा था. मैने हमारे उद्धार के लिए परमेश्वर की योजना के बारे मे स्पष्ट और सरल संदेश दिया. दूसरे शहर मे भी पहले जितने लोग ही उपस्थित थे, लेकिन एक बडा फर्क था. पहले शहर से ज्यादा दूसरे शहर मे लोगों ने मसीह को अपना दिल देने के बारे मे बडा प्रतिउत्तर दिया. मै सोचने लगा कि ऐसा क्यों हुआ. दोनों जगह पर लोगों के लिए प्रार्थना की गई. दोनों शहरों मे लगभग उतने ही अविश्वासी सभाओं मे आए थे. फिर मैने जाना कि पहले शहर मे हमें साऊन्ड सिस्टम की समस्या थी. पहले शहर के लोगों ने दूसरे शहर जैसे परमेश्वर के वचन की घोषणा अच्छे से नही सुनी थी. दूसरे शहर मे आवाज़ बहुत ही स्पष्ट थी. उस पल एक महान सच्चाई मेरे सामने आयी. विश्वास केवल तब आता है जब हम परमेश्वर का वचन स्पष्ट और सरल रुप मे सुनते हैं. हम परमेश्वर का वचन कैसे सुनते हैं यही निश्चित करता है कि हम विश्वास को कैसे प्रतिउत्तर देते हैं.

चौथा तरिका है जिसके द्वारा हम अपने जीवन मे वचन ले सकते हैं, वो है - परमेश्वर के वचन को याद करना. ये हमें कई तरह से बढने मे मदत करता है. पहला, जब हम वचन याद करते हैं, तो वो हमें जरुरत के समय वचन का उपयोग करने के लिए सहायक होता है. हम उसे अपने प्राण के भीतरी भाग मे रखते हैं. जिस पल हमें किसी प्रतिज्ञा, आज्ञा या गवाही की जरुरत होती है, परमेश्वर के वचन के द्वारा प्रभु का प्रयोजन हमारे मन मे आता है. इस तरह हम अपना मन नया बना सकते हैं. हम "हर विचार बंद बनाकर उसे मसीह का आज्ञाकारी बना सकते हैं" (२ कुरि. १०:५). दूसरा है, हम हमारे विश्वास के बारे मे किए गएं सवालों पर हर मौके पर जवाब दे पाएगे. परिणाम स्वरुप, हमारे विश्वास के बारे मे दूसरों को बताने के लिए हम मे हिम्मत आएगी.

अंत मे, हमें परमेश्वर के वचन का अध्यन करना है. प्रेरित पौलूस जवान तीमुथियुस से कहता है,"अपने आपको परमेश्वर का ग्रहणयोग्य और ऐसा काम करनेवाला ठहराने का प्रयत्न कर,जो लज्जित होने न पाए, और जो सत्य के वचन को ठीक रीति से काम में लाता है (२ तीमुतियुस २:१५). हम बाइबल का अध्यन कई तरिके से करते हैं. फिर भी, चाहे हम किसी भी तरीके से बाइबल का अध्यन करें, हमेशा हमारे पास उसमे परमेश्वर से मुलाकात करने का दिल हो. अध्यन करें, केवल बुद्धि की समझ पाने के लिए नही, लेकिन परमेश्वर को उत्तम रुप मे जानने के लिए अध्यन करे. आत्मिक जीवन की महान व्यक्तिगत उन्नति मूसा के जीवन चरित्र का अध्यन करने के द्वारा आयी. इस अध्यन के दौरान प्रभु से मेरी मुलाकात हुई और उसने मेरे जीवन की दिशा ही बदल दी. दूसरे और भी तरिके के अध्यन हैं जो आप खुद के लिए कर सकते हैं. आप बाइबल का विवरणात्मक अध्यन कर सकते हैं - एक एक वचन का अध्यन या एक एक किताब का अध्यन कर सकते हैं. या आप बाइबल के विषयों पर अध्यन कर सकते हैं, परमेश्वर के अनग्रह के बारे मे अध्यन या प्रार्थना या और कोई विषय. एक और तरिका है जिससे आप परमेश्वर के वचन का अध्यन कर सकते हैं वो है शब्द का अध्यन. बाइबल का उपयोग कर आप उस शब्द के असली अर्थ का अध्यन कर सकते हैं. चाहे आप वचन का अध्यन करने के लिए किसी भी तरिके का उपयोग करें, केवल निश्चित कर ले कि आप ऐसे दिल से इसे कर रहे हैं जो परमेश्वर को जानने के लिए भूखा है.

बाइबल कहती है कि परमेश्वर ने मूसा से "आमने-सामने बातें की, जैसे कोई मनुष्य के साथ करता है" (निर्गमन ३३:११). परमेश्वर आप से भी उतने ही व्यक्तिगत रुप मे बात करना चाहता है जैसे उसने मूसा से बात की थी. वो इसे परमेश्वर के वचन के द्वारा करता है. अगर आप चाहते हैं कि परमेश्वर अपने दिल की बात आपको बताएं, तो आपको परमेश्वर का वचन अपने जीवन मे लेना ही होगा. जब परमेश्वर बात करेगा, आप शुद्ध होगे, और आप विजय मे चलना शुरु करेगे.