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devotions
मूसा का विश्वास – जोखिम भरा जीवन

बाइबल बताती है कि “विश्वास के बिना परमेश्वर को प्रसन्न करना असम्भव है।” विश्वास ही है जो परमेश्वर के दास या दासी की नियती निर्धारित करता है। यह उनकी पहचान तथा जीवन के आदर्शों को निर्धारित करता है। प्रत्येक आशीष की प्राप्ति तथा प्रत्येक बाधा पर विजय विश्वास के माध्यम से ही मिलती है। पूर्ण रूप से विजयी मसीही जीवन वही होता है जो पूर्णतः विश्वास से जिया जाता है।

मूसा भी विश्वास से ही परमेश्वर का दास बना। परमेश्वर ने जिस भी कार्य में मूसा को इस्तेमाल किया, वह विश्वास का कार्य था। उसने जितने भी चमत्कार किए, वे सब विश्वास से ही किए। प्रत्येक विजयी पुरुष और स्त्री में एक सामान्य गुण होता है, विश्वास।

बाइबल उन तीन विशिष्ट चयनों के बारे में बताती है जिनमें मूसा ने विश्वास के साथ कार्य किया। पहले उसने नई पहचान का चयन किया। पवित्रशास्त्र बताता है, “विश्वास ही से मूसा ने सयाना होकर फिरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इनकार किया” (इब्रानी 11:24)। मूसा अपनी पहचान के संकट का सामना कर रहा था। उसकी पहचान कैसे होगी – फिरौन की बेटी का पुत्र या इब्री गुलाम का पुत्र? अन्त में, मूसा ने सही चयन कर ही लिया। उसने परमेश्वर के लोगों के साथ पहचान का चयन किया।

बहुत सारे विश्वासी हारा हुआ जीवन जीते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी पहचान के बारे में गलत चयन किया हुआ है। वे मसीह तथा उसके लोगों के साथ अपनी पहचान से शर्माते हैं। परिणामस्वरूप, वे हमेशा हारते हैं। यदि हम विजयी जीवन जीना चाहते हैं, तो हम अपने मुक्तिदाता और उसके लोगों से शर्मिन्दा नहीं हो सकते।

मूसा ने यह चयन भी किया कि जीवन में वास्तव में महत्वपूर्ण है क्या? उसके विश्वास ने बहुत ऊँचे आदर्शों का निर्माण किया। आदर्श वे होते हैं जिन बातों को हम सचमुच महत्वपूर्ण मानते हैं। जब तक वह मिस्र में रहा, तब तक उसके आदर्श गलत थे। परमेश्वर उसे जीवन के ऐसे दोराहे पर ले आया जहाँ उसे चयन करना पड़ा – यश और धन या सताव और निन्दा। मूसा ने सताव और निन्दा का चयन कर लिया और मानवीय इतिहास का सबसे अधिक प्रसिद्ध व्यक्ति बन गया। यश और धन बाहर से तो अच्छे लगते हैं परन्तु भीतर से वे सड़े हुए होते हैं और अन्त में उनका पीछा करने वाले व्यक्ति को वे हार में खींच लेते हैं। दूसरी ओर, किसी भी कीमत पर परमेश्वर का आज्ञापालन करना कठिन तथा अक़्सर ख़तरनाक जान पड़ता है, परन्तु यह जीवन तथा विजय की ओर ले जाता है, और सम्भव है कि उस यश की ओर भी ले जाए जिसे हमने ठुकरा दिया था। बाइबल बताती है कि मूसा को “पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दुख भोगना और उत्तम लगा और मसीह के कारण निन्दित होने को मिस्र के भण्डार से बड़ा धन समझा क्योंकि उसकी आँखें फल पाने की ओर लगी थीं” (इब्रानी 11:25-26)।

अन्त में, मूसा ने डर के स्थान पर विश्वास का चयन किया। उसने उन लोगों से डरने के स्थान पर, जिन्हें वह प्रतिदिन देखता था, उस पर भरोसा करने का चयन किया, जिसे वह देख नहीं सकता था। शैतान चाहता था कि मूसा अपना ध्यान राजा पर लगाए रखे। परन्तु उसने अपनी आँखें राजाओं के राजा पर लगाए रखीं। “विश्वास ही से राजा के क्रोध से न डर कर उसने मिस्र को छोड़ दिया क्योंकि वह अनदेखे को मानो देखता हुआ दृढ़ रहा” (इब्रानी 11:27)।

बहुत सारे मसीही परमेश्वर के साथ अपने जीवन का आरम्भ तो अच्छा करते हैं परन्तु समापन अच्छा नहीं करते। डर उन्हें अपंग बना देता है। दृढ़ता विश्वास से उत्पन्न होती है। डर तथा विश्वास एक ही घर में नहीं रह सकते। विश्वास आजीवन विजय दिलाता है। यह केवल एक चयन है। मूसा ने परमेश्वर पर दृष्टि लगाने का चयन किया। आपका चयन क्या है?