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devotions
मूसा- परमेश्वर का मित्र

जब जीवन का अन्त आएगा तो आप किस प्रकार से याद किए जाना चाहेंगे? क्या आप अपनी एक छाप छोड़कर जाना चाहेंगे? यदि आपको अपनी क़ब्र के पत्थर पर एक वाक्य लिखना हो तो आप उस वाक्य में अपने जीवन की क्या परिभाषा देंगे? इन प्रश्नों का आपका उत्तर आपके व्यक्तितव की संक्षिप्त परिभाषा देता है।

बाइबल में मूसा का विवरण कई प्रकार से दिया गया है। उसे “परमेश्वर का जन, इस्राएल में सबसे महान नबी और प्रभु का एक दास” कहा जाता है। परन्तु मूसा का एक सबसे दिलचस्प विवरण है, “परमेश्वर का मित्र।” बाइबल कहती है, “यहोवा मूसा से ऐसे आमने-सामने बातें करता था, जैसे कोई मनुष्य अपने मित्र से बात करता है” (निर्गमन 33:11)। मूसा ने परमेश्वर के साथ एक घनिष्ठ सम्बन्ध बनाए रखा - इतना घनिष्ठ कि उसे हमेशा के लिए परमेश्वर के मित्र का दर्जा मिल गया।

मुझे बहुत लोग कहते हैं कि परमेश्वर उनका मित्र है परन्तु शायद ही मुझे किसी से यह सुनने को मिलता है, “मैं परमेश्वर का मित्र बनना चाहता हूँ।” परमेश्वर का मित्र वह है जो उसकी आवाज़ को सुनता और उसका पालन करता है। परमेश्वर के साथ मूसा के सम्बन्ध में, हर हमय केवल मूसा ही नहीं बोलता था। बल्कि, वह परमेश्वर की आवाज़ सुनता था।

बहुत वर्ष पहले जब मैं इस्राएल की यात्रा पर था तो एक यहूदी विश्वासी ने मुझसे कहा, “इस देश में बहुत सारे लोग अलग-अलग प्रेरणाओं के साथ आते हैं। वह पर्यटकों के रूप में या बाइबल के विषय में और अधिक सीखने के लिए आते हैं। परन्तु बहुत कम हैं जो परमेश्वर को और अधिक जानने के उद्देश्य के साथ आते हैं।” फिर उसने कहा, “मैं ऐसा व्यक्ति व्यक्ति बनना चाहता हूँ जो परमेश्वर के हृदय को जानता है। मैं परमेश्वर का मित्र बनना चाहता हूँ।

परमेश्वर का विजयी जन वह है जो परमेश्वर का मित्र है अर्थात जिसने परमेश्वर को सुनना और परमेश्वर से एक घनिष्ठ स्तर पर बातचीत करना सीख लिया है। इस प्रकार की घनिष्ठता वाले लोग बहुत व्यस्त होते हैं और उनके पास कई जिम्मेदारियाँ होती हैं। अक्सर वह बातचीत के गहरे स्तर को बनाए नहीं रख पाते। वहीं मूसा ने ऐसा नहीं होने दिया। वह बहुत ही व्यस्त व्यक्ति था। वह कोई तीस लाख लोगों के लिए जिम्मेदार था। उस पर उन्हें खाना, कपड़ा और छत देने और उनका नेतृत्व करने की जिम्मेदारी थी। कैसे मूसा एक ही समय पर अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने के साथ-साथ “परमेश्वर का मित्र” भी बना रहा? बात साधारण सी है! वह अपना तम्बू छावनी के बाहर लगाता था, जहाँ जाकर वह परमेश्वर से मिलता था। यह पर्याप्त जगह थी जहाँ वह उससे, जिससे वो प्रेम करता था, घनिष्ठता के साथ वार्तालाप कर सकता था। जो परमेश्वर का मित्र होता है वह ऐसी जगह और स्थान ढूँढ ही लेता है जहाँ वह अकेले में परमेश्वर के हृदय को सुन पाए। वह हाथ में बाइबल और परमेश्वर के हृदय को सुनने के लिए आत्मिक कानों के साथ आता है और परमेश्वर उसपर इतना भरोसा करता है कि उसके साथ अपने हृदय के गहरे भेदों को बाँटता है।

परमेश्वर का मित्र ऐसा नहीं होता जो उसकी उपस्थिति में आते-जाते हमेशा जल्दी में होता है। वार्तालाप में समय लगता है। मार्टिन लूथर कहा करते थे कि वह जितने अधिक व्यस्त होते गए, उन्हें प्रार्थना के लिए उतने ही अधिक समय की आवश्यकता पड़ी। जिम्मेदारियों और व्यस्तता के प्रति हममें से अधिकतर लोगों का प्रतिउत्तर इसके विपरीत होता है। सबसे पहला काम हम यह करते हैं कि परमेश्वर के साथ अपने घनिष्ठता के समय में कटौती कर देते हैं। परन्तु यदि हम वास्तव में परमेश्वर के जन बनना चाहते हैं तो हमें यह सीखना अनिवार्य है कि पिता परमेश्वर के साथ पर्याप्त समय बिताए बिना यह नहीं हो सकता।

हमें अपनी प्राथमिकताओं को पुन: व्यवस्थित करना होगा। आवश्यक है कि हमारे जीवन में परमेश्वर के साथ हमारी मित्रता का स्थान प्रथम हो।

हम अपने बच्चों और नाती-पोतों के लिए क्या विरासत छोड़ कर जाएँगे? यह इस पर निर्भर करता है कि हमारे लिए क्या महत्वपूर्ण है और इसपर कि जो महत्वपूर्ण है, हम उसके लिए समय दें। आपके लिए यह बात कितनी महत्वपूर्ण है कि आप परमेश्वर के मित्र बनें?