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devotions
मूसा – दीनता

बाइबल में एक बार प्रश्न पूछा गया, “तुम्हारा परमेश्वर यहोवा तुम से क्या चाहता है?” जो व्यक्ति परमेश्वर का जन बनना चाहता है उसके लिए यह बहुत अच्छा प्रश्न है। यदि हम परमेश्वर के जन बनना चाहते हैं तो इसके लिए परमेश्वर हमसे क्या चाहता है? इसका उत्तर मीका 6:8 में दिया गया है, “न्याय से काम कर, और कृपा से प्रीति रख, और अपने परमेश्वर के साथ नम्रता से चल”। इन पदों में बताई गई अन्तिम मांग ही है जो हमें वह सब बनने में सक्षम बनाएगी जो परमेश्वर हमें बनाना चाहता है।

बाइबल कहती है, “मूसा पृथ्वी भर के रहने वाले सब मनुष्यों से बहुत अधिक नम्र स्वभाव का था” (गिनती 12:3)। यह एक महत्वपूर्ण कथन है तथा हमें बताता है कि मूसा परमेश्वर के द्वारा इतने सामर्थी रूप से इस्तेमाल कैसे हो सका। जवानी में मूसा बलवान, सामर्थ्यवान तथा अभिमानी था। परन्तु मिद्यानी मरुस्थल में उस पर्वत पर परमेश्वर के साथ मुलाकात कर लेने के बाद उसका हृदय पूर्णतः बदल गया। वह पृथ्वी के सबसे सामर्थ्यवान व्यक्ति के स्थान पर अब पृथ्वी का सबसे नम्र व्यक्ति बन गया। जब मूसा मिद्यानी मरुस्थल से आया, वह दीनता के स्कूल से डिग्री प्राप्त कर चुका था।

परमेश्वर के किसी भी जन का प्रमुख गुण दीनता ही है। अगस्टीन ने इस प्रकार कहा कि दीनता अन्य सभी गुणों की जननी है। यह सच है क्योंकि अन्य सभी गुण दीन हृदय से ही निकलते हैं। यदि ऐसा है तो दीनता परमेश्वर के जन के निर्माण के लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों है? इसके भी कुछ कारण हैं।

पहला, दीनता मसीह के जीवन का मूल आधार है। यीशु परमेश्वर था, है और हमेशा रहेगा। फिर भी, उसने अपने आप को इतना आज्ञाकारी बना लिया कि मृत्यु, यहाँ तक कि क्रूस की मृत्यु भी सह ली। उसने अपना स्वर्गिक सिंहासन छोड़ दिया और मानवीय शरीर धारण कर लिया। इस पृथ्वी पर यीशु का मूल स्वभाव उसकी दीनता में मिलता है अर्थात परमेश्वर मनुष्य बन गया। जो व्यक्ति परमेश्वर का जन बनना चाहता है उसके हृदय की चाहत यही होनी चाहिए कि पहले मैं यीशु जैसा बनूँ। और यीशु जैसा बनने का अर्थ है “परमेश्वर के साथ दीनता में जीवन बिताना।”

दूसरा, हम दीनता के बिना अनुग्रह में आगे नहीं बढ़ सकते। पवित्रशास्त्र कहता हैः “परमेश्वर अभिमानियों का विरोध करता है, पर दीनों पर अनुग्रह करता है” (याकूब 4:6)। यह साधारण परन्तु गहन सत्य है। अभिमानी हृदय परमेश्वर के विरोध का सामना करता है जबकि दीन हृदय परमेश्वर से आशीषें प्राप्त करता है। बहुत लोग परमेश्वर के लिए बड़े-बड़े काम तो करना चाहते हैं, परन्तु वे यह समझने में असफल हो जाते हैं कि पहले उन्हें परमेश्वर के साथ दीनता में जीवन बिताना है। हम जो कुछ सम्भवतः बन सकते हैं वह सब परमेश्वर के अनुग्रह से ही बनते हैं। हमारा उद्धार अनुग्रह से हुआ है, हमें अनुग्रह से ही क्षमा मिली है, और हमारी वृद्धि भी अनुग्रह से ही होती है।

यदि दीनता इतनी महत्वपूर्ण है, तो हमें यह भी समझना चाहिए कि यह है क्या। दीनता कोई पदक नहीं है जिसे हम अपनी कमीज़ पर लगा कर घूमें। यह एक भीतरी प्रवृति है जो यीशु के इस कथन के सत्य को समझ जाती है, “मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते” (यूहन्ना 15:5)। दीनता परमेश्वर को अर्थात उसकी महानता, सामर्थ्य तथा पवित्रता को देखने से आती है। जब हम जान जाते हैं कि वह कितना महान तथा सामर्थी है, तब हम दीन होकर उसकी श्रद्धा में झुक जाएँगे। हम पुकार उठेंगे, “हे परमेश्वर, मैं कुछ नहीं कर सकता, परन्तु आप कर सकते हैं। मैं अपनी क्षमताओं पर नहीं, बल्कि आपके सामर्थ्य पर भरोसा रखूँगा।”

दीनता का आरम्भ परमेश्वर को उसकी पवित्रता में देख लेने से होता है। मूसा पवित्र भूमि पर खड़ा हो चुका था। उसके बाद परमेश्वर ने कहा कि वह “पृथ्वी भर के रहने वाले सब मनुष्यों से बहुत अधिक नम्र स्वभाव का था।” आपने परमेश्वर को उसकी पवित्रता में कब देखा था? पवित्र भूमि पर अभिमान का कोई स्थान नहीं है – वहाँ केवल दीन हृदय को ही आने की अनुमति है।