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devotions
मूसा – जब परमेश्वर के जन का पतन होता है

यह आज्ञा तो सरल थी परन्तु काम असम्भव था। परमेश्वर ने मूसा से कहा, “उस लाठी को ले, और तू अपने भाई हारून समेत मण्डली को इकट्ठा करके उनके देखते उस चट्टान से बातें कर, तब वह अपना जल देगी; इस प्रकार से तू चट्टान में से उनके लिए जल निकाल कर मण्डली के लोगों और उनके पशुओं को पिला” (गिनती 20:8)। मूसा का काम केवल इतना था कि उसे चट्टान से बात करनी थी। बात बहुत सरल थी। परन्तु क्या यह सचमुच जल देती जिसकी इस्राएलियों को अत्याधिक आवश्यकता थी? इसके लिए परमेश्वर के सामर्थ्य तथा अलौकिक हस्तक्षेप की आवश्यकता थी।

तथापि, मूसा पहले ही परमेश्वर को इससे भी बड़े-बड़े चमत्कार करते हुए देख चुका था। जब मूसा ने अपनी लाठी उठाई थी तो लाल समुद्र विभाजित हो गया था। परमेश्वर ने अपने लोगों के लिए स्वयं को यहोवा-यिरे प्रमाणित किया था। अतः मूसा ने परमेश्वर का आज्ञाउल्लंघन क्यों किया? चट्टान से बात करने के स्थान पर उसने उस पर अपनी लाठी से प्रहार कर दिया। देखने में यह एक छोटी-सी गलती लगती है। फिर भी, इसी गलती के कारण मूसा उस देश में प्रवेश नहीं कर पाया जिसकी प्रतिज्ञा उसके पूर्वजों से की गई थी।

बाइबल कहती है, “यहोवा की इस आज्ञा के अनुसार मूसा ने उसके सामने से लाठी को ले लिया। और मूसा और हारून ने मण्डली को उस चट्टान के सामने इकट्ठा किया। तब मूसा ने उनसे कहा, ‘हे दंगा करने वालो, सुनो; क्या हमको इस चट्टान से तुम्हारे लिए जल निकालना होगा?’ तब मूसा ने हाथ उठाकर लाठी चट्टान पर दो बार मारी और उसमें से बहुत पानी फूट निकला, और मण्डली के लोग अपने पशुओं समेत पीने लगे। परन्तु मूसा और हारून से यहोवा ने कहा, ‘तुम ने जो मुझ पर विश्वास नहीं किया और मुझे इस्राएलियों की दृष्टि में पवित्र नहीं ठहराया, इसलिए तुम इस मण्डली को उस देश में पहुँचाने ने पाओगे जिसे मैंने उन्हें दिया है’” (गिनती 20:9-12)। शायद पहली बार इसे पढ़ने वाला पूछे, “इसमें क्या बड़ी बात है? उसने चट्टान से बोलने की बजाय उस पर लाठी ही तो मारी थी और उसमें से पानी फूट निकला। क्या ऐसा ही नहीं हुआ? तो फिर परमेश्वर मूसा के प्रति इतना कठोर क्यों हो गया?”

इस प्रश्न का उत्तर मूसा के प्रति परमेश्वर के प्रतिउत्तर में मिलता है, “तुम ने जो मुझ पर विश्वास नहीं किया और मुझे इस्राएलियों की दृष्टि में पवित्र नहीं ठहराया…” वह चट्टान मसीह का प्रतीक थी (1 कुरिन्थियों 10:4)। इस प्रकार मूसा ने उस पर प्रहार कर दिया था जो पवित्र था। इस अपमान को बढ़ाते हुए उसने यह सब उन लोगों के सामने किया था जिनकी वह अगुवाई कर रहा था। उसका अगुवापन स्थायी रूप से समाप्त होने पर था। अन्य लोग मूसा के समतुल्य सम्मानीय नहीं थे। परन्तु अन्यों ने वह नहीं देखा था जो मूसा देख चुका था। मिद्यानी मरुस्थल में वह परमेश्वर के साथ मुलाकात कर चुका था, और परमेश्वर का जो गुण मूसा के सामने सबसे पहले प्रगट हुआ वह पवित्रता ही था। मूसा ने हानि उठाकर यह सीखा कि अगुवों को निरंतर मसीह के चरित्र के अनुरूप जीवन जीना चाहिए।

मूसा का पाप दोहरा था – उसने परमेश्वर का आदर नहीं किया और परमेश्वर पर भरोसा नहीं रखा। मूसा की असफलता से हम कुछ बढ़िया सबक सीख सकते हैं। पहला, हम अविश्वास के साथ अगुवाई नहीं कर सकते। अगुवाई के लिए विश्वास की आवश्यकता पड़ती है। परमेश्वर निरंतर हमारे सामने कठिन परीस्थितियाँ लाता रहेगा। यदि हम आगे बढ़कर प्रतिज्ञा किया हुआ देश जीतना चाहते हैं तो अवश्य है कि हम उसपर पूर्णतः भरोसा रखें। विश्वास तथा विजय साथ-साथ चलते हैं।

दूसरा, लोगों की अगुवाई करते समय हमारा हृदय मसीह के प्रति आदरभाव से भरा होना चाहिए। शिष्य साधारण पुरुष तथा स्त्रियाँ थे जो मसीह के साथ रहे थे। उसके ज्ञान के साथ तथा उसे प्रभु के रूप में सम्मान देते हुए, उन्होंने सारे संसार में उसकी महिमा फैला दी। यदि हम भी अपने संसार पर मसीह का प्रभाव डालना चाहते हैं तो अवश्य है कि हम अपने हृदय को उसके लिए आदरभाव से भर लें। अक्सर युद्ध के मध्य में हम उस आदरभाव को छोड़ देते हैं। हम क्रोध तथा कड़वाहट के कारण काम करने लग जाते हैं। मूसा के साथ भी ऐसा ही हुआ और उसे इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। अवश्य है कि हम अपने हृदय में ऐसा कुछ न आने दें जो मसीह के प्रति हमारे साधारण तथा शुद्ध समर्पण में बाधा बने।

विजयी पुरुष तथा स्त्रियों ने यह सीखा है कि विश्वास तथा आदरभाव की कमी उन्हें वह सब प्राप्त करने से रोकेगी जो परमेश्वर ने उनके लिए रखा है। मूसा अब भी परमेश्वर का जन ही था। वह इस्राएल के इतिहास का सबसे महान अगुवा था। उसने उस सबसे भी कहीं बढ़कर देखा जिसके बारे में अधिकतर लोग सपने में भी नहीं सोच सकते। फिर भी, वह अपने जीवन में परमेश्वर के उद्देश्य से चूक गया। यह सब केवल दो छोटे-छोटे पापों के कारण हुआ, जो शायद वास्तव में छोटे नहीं थे। विश्वास तथा आदरभाव की कमी चोर हैं। वे लोगों से यह अवसर चुरा लेते हैं कि वे अपने जीवन में परमेश्वर का उद्देश्य पूरा कर सकें। अतः, “भरोसा रखें और आज्ञापालन करें। यीशु पर भरोसा रखने और उसका आज्ञापालन करने के अलावा खुश रहने का कोई और तरीका नहीं है।”