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devotions
मूसा / यहोशू – नए अगुवे तैयार करना

अवश्य है कि प्रत्येक पीढ़ी स्वर्ग का ताज़ा स्पर्श प्राप्त करे। परमेश्वर का अभिषेक तथा आश्चर्यकर्म एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक उत्तराधिकार के रूप में स्थानान्तरित नहीं किए जा सकते। यह सच है कि हम अपनी सन्तान के लिए धरोहर तथा आदर्श छोड़कर जा सकते हैं परन्तु अवश्य है कि वे परमेश्वर के राज्य में अपना मार्ग स्वयं तैयार करें। उन्हें अपने युद्ध स्वयं लड़ने होंगे। परमेश्वर की संतान तो अनगिनत हैं, परन्तु नाती-पोते एक भी नहीं हैं। उसकी सेना में जनरल तो बहुत हैं, परन्तु उच्च जनरल एक भी नहीं है। परमेश्वर के बुद्धिमान जन इस बात को समझ जाते हैं कि परमेश्वर का राज्य उनसे बड़ा है और उनके जीवनकाल से कहीं अधिक समय तक कायम रहेगा।

मूसा को परमेश्वर ने बहुत सामर्थ के साथ उपयोग किया। वह “इस्राएल के इतिहास का सबसे बड़ा नबी” हुआ। परन्तु वह जानता था कि इस संसार से उसके पलायन के बाद भी परमेश्वर का कार्य जारी रहेगा। सारी सम्भावनाओं को ध्यान में रखते हुए वह एक ऐसे नौजवान की खोज करने लगा जिसका हृदय परमेश्वर को समर्पित हो और जो इस्राएली प्रजा की अगुवाई करने में सक्षम हो। यहोशू के रूप में उसे ऐसा व्यक्ति मिल गया।

मूसा ने यहोशू से कहा, “हमारे लिए कई पुरुषों को चुनकर छाँट ले और बाहर जाकर अमालेकियों से लड़ और मैं कल परमेश्वर की लाठी हाथ में लिए हुए पहाड़ी की चोटी पर खड़ा रहूँगा। मूसा की इस आज्ञा के अनुसार यहोशू अमालेकियों से लड़ने लगा और मूसा, हारून और हूर पहाड़ी की चोटी पर चढ़ गए। जब तक मूसा अपना हाथ उठाए रहता था तब तक तो इस्राएल प्रबल होता था, परन्तु जब जब वह उसे नीचे करता, तब तब अमालेक प्रबल होता था। पर जब मूसा के हाथ भर गए, तब उन्होंने एक पत्थर लेकर मूसा के नीचे रख दिया और वह उस पर बैठ गया और हारून और हूर एक एक अलंग में उसके हाथों को सम्भाले रहे और उसके हाथ सूर्यास्त तक स्थिर रहे और यहोशू ने अनुचरों समेत अमालेकियों को तलवार के बल से हरा दिया” (निर्गमन 17:9-13)।

यह देखना रुचिकर था कि मूसा ने नौजवान यहोशू को युद्ध में कैसे भेज दिया। हालाँकि उसने यहोशू को युद्ध लड़ने के लिए भेजा परन्तु वह उससे दूर नही हुआ। वह यहोशू की दृष्टि सीमा में ही रहा और विजय के स्रोत की ओर इशारा करता रहा। मूसा ने बड़ी बुद्धिमानी से यहोशू को युद्ध में भेजा और विजय दिलाई, परन्तु विजय प्राप्त करने तक उसे दिशानिर्देश देता रहा।

हम मूसा तथा यहोशू के सम्बन्ध में एक पद्धति को उभरते हुए देखते हैं। पहले मूसा परमेश्वर का कार्य करता है। फिर, मूसा यहोशू को परमेश्वर का कार्य करने के लिए कहता है जबकि स्वयं पास में खड़ा रहता है। अन्त में मूसा के पलायन के बाद सारा कार्य यहोशू को ही करना था। अगुवों की नई पीढ़ी तैयार करने के लिए परमेश्वर की पद्धति यही है। पहले, हम कार्य करते हैं। तब वे हमारे साथ कार्य करते हैं। अन्त में वे कार्य करते हैं।

परन्तु मूसा ने परमेश्वर के कार्य में यहोशू को तैयार करने के साथ-साथ और भी कुछ किया। उसने उसे परमेश्वर के साथ उसके आचरण में अनुशासित किया। बाइबल बताती है, “तब यहोवा ने मूसा से कहा, ‘पहाड़ पर मेरे पास चढ़ आ और वहीं रह और मैं तुझे पत्थर की पटियाएँ और अपनी लिखी हुई व्यवस्था और आज्ञा दूँगा कि तू उनको सिखाए।’ तब मूसा यहोशू नामक अपने सेवक समेत परमेश्वर के पर्वत पर चढ़ गया” (निर्गमन 24:12-13)। जब मूसा की परमेश्वर के साथ वह अद्भुत मुलाकात हुई, तब यहोशू वहाँ से अधिक दूर नहीं था।

जब मूसा परमेश्वर से “मिलाप वाले तम्बू” में मिलता था और परमेश्वर की उपस्थिति बहुत शक्तिशाली रूप से वहाँ होती थी, तब यहोशू उसके साथ तम्बू में रहता था। यहाँ तक कि जब मूसा वहाँ से चला जाता था, यहोशू तब भी तम्बू में ही ठहरा रहता था। वह परमेश्वर की उपस्थिति को छोड़ना नहीं चाहता था। मूसा ने यहोशू को न केवल परमेश्वर के कार्य के लिए तैयार किया, बल्कि उससे भी बढ़कर उसे परमेश्वर के साथ घनिष्ठ जीवन जीना भी सिखाया।

लोगों को परमेश्वर के बाहरी कार्य करने के लिए प्रशिक्षित करना सरल होता है, जबकि उन्हें दीन होकर परमेश्वर के साथ घनिष्ठ जीवन जीने के लिए प्रशिक्षित करना एक अलग चुनौती है। परन्तु मूसा समझ गया था कि परमेश्वर का कार्य आत्मिक है जिसे आत्मिक लोग ही पूरा कर सकते हैं। इस्राएली प्रजा को मिस्र में से मूसा छुड़ाकर लाया परन्तु प्रतिज्ञा किए हुए देश में उन्हें यहोशू लेकर गया। क्योंकि मूसा ने यहोशू को तैयार किया था इसलिए जो कार्य उसने आरम्भ किया था वह उसकी मृत्यु के साथ रूक नहीं गया। एक नई पीढ़ी जिम्मेदारी को अपने हाथों में लेकर अपनी दौड़ दौड़ने के लिए तैयार थी।

यदि हम बुद्धिमान हैं, तो हम न केवल परमेश्वर का कार्य करेंगे बल्कि अगली पीढ़ी की भी सहायता करेंगे कि वे परमेश्वर को जानें, उससे प्रेम करें और उसके साथ चलें ।