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devotions
विजयी मसीही प्रार्थना सामान्य प्रार्थना है

"मै अपने प्रार्थना के जीवन में परेशानी का सामना करता हूं" अकसर विश्वासीयों की यही शिकायत होती है. बहुत से लोगों ने मुझ से कहा,"प्रार्थना मेरे लिए एक धार्मिक विधी हो गई है" या "मुझे निरंतर प्रार्थना का जीवन बनाएं रखने में परेशानी होती है." सामान्य विश्वासी दिन में केवल तीन से चार बार प्रार्थना करता है और वो सामान्य रुप में भोजन के समय ही. लेकिन सामान्य विश्वासी का प्रार्थना जीवन और सटिक विश्वासी का प्रार्थना जीवन दोनों पूरी तरह से अलग है.

मैने ये जाना कि बहुत से विश्वासीयों मे प्रार्थना करनेवाला व्यक्ति बनने की इच्छा होती है लेकिन वो नही जानते हैं कि कहां से शुरु करें. विजयी मसीही प्रार्थना सामान्य मसीही प्रार्थना है. इसके बारे में उल्झानेवाली कोई बात नही है. महान मध्यस्थ होने के लिए बडे थियॉलॉजियन या बहुत उत्तम वक्ता होने की जरुरत नही है क्योंकि प्रार्थन बुद्धिमत्ता पर आधारित बातचित नही है. ये दो दिल की बातचित है - परमेश्वर का दिल और मनुष्य का दिल. परमेश्वर महान वक्ता होने की योग्यता नही देखता है. वो नम्र दिल खोजता है. किसी के भी पास अगर ऐसा दिल है जो परमेश्वर को जानना और उससे प्यार करना चाहता है. वो मध्यस्थ होने के लिए परमेश्वर की सेना में जुडने के योग्य है.

हमारे प्रार्थना के जीवन में विजयी होने के लिए हमें प्रार्थना का तरिका जानना होगा. विजयी मसीही प्रार्थना के लिए पहला कदम है, तो ये समझना है कि प्रार्थना परमेश्वर का अनुग्रहपूर्ण न्योता है कि हम में से हरएक उसकी उपस्थिती में आएं. बाइबल परमेश्वर के सिंहासन को "अनुग्रह का सिंहासन" कहती है (इब्रानियों ४:१६). इस सबसे पवित्र परमेश्वर तक पहुंचने के लिए एक ही मार्ग है, वो है उसके अनुग्रह के द्वारा. जब हम ये महान सच्चाई समझ लेते है, तो प्रार्थना विस्फोटक होती है और परमेश्वर के साथ हमारे समय से शान्ति और आनंद उमडकर बाहर आता है.

हर सुबह मै उसकी उपस्थिती में चकित होकर खडा रहता हूं. जब मै उसकी उपस्थिती मे आता हूं, वो उससे कुछ पाने के लिए नही, जब कि मै उससे जो भी मांगता या सोच सकता उससे भी बढकर उसने मुझे दिया है. मै उसके हाथ मरोडने की कोशिश नही करता, लेकिन उसके बजाए मै अपना दिल झुकाता हूं. परमेश्वर की उपस्थिती में आने का उद्देश उसे नज़दिकी से जानना है. उसका अनुभव करना है. प्रार्थना एक व्यवहारिक तरिका है कि हम "अपने पिता, सर्वसामर्थी परमेश्वर, शान्ति के राजकुमार, जो संसार के सिंहासन पर विराजमान होता है" उसके साथ प्रेमपूर्ण संबंध बनाए. इसमें कुछ भी उबाउ और बेकार की बात नही है. ये कितना रोमांच है! कि उसे जाने जो सबको और सारी चिज़ों को जानता है.

जब हम प्रार्थना में इस दृष्टिकोण को बढाते हैं, तब वो काम के बजाए आनंद होती है; धर्म के बजाए संबंध होता है और हार के बजाए विजय होती है. स्तुति और धन्यवाद देना शर्म और कुडकुडाने के बजाए सामान्य बात होती है. विजयी मध्यस्थ का मुख्य स्वभावगुण प्रेम ही होता है. क्योंकि प्रार्थना अनुग्रह से ही बहती है, मध्यस्थ परमेश्वर के प्रेम में वास करता है. वो परमेश्वर से प्रेम का अनुभव करता है, वो परमेश्वर के लिए प्रेम में बदल जाता है. सारी चिज़ो से बढकर, प्रार्थना बातचित का माध्यम होती है. हमारे लिए उसका जो प्रेम है, वो उसे दर्शाता है, और हम उसके लिए हमारे प्रेम का अनुभव करते है.

प्रार्थना दो दिलों का मेल है - परमेश्वर का दिल और मनुष्य का दिल. परमेश्वर का दिल पूरी तरह से शुद्ध और पवित्र है. उसका दिल सर्वसामर्थी और अनंतकाल का दिल है. हमारा दिल छोटा,अशुद्ध, सारी बातों में हमारा दिल सबसे ज्यादा धोका देनेवाला है. फिर भी यीशु के लहू के द्वारा हमें उसकी उपस्थिती मे आने की अनुमति दी जाती है. वाह! ये विजयी प्रार्थना है. केवल परमेश्वर को जानना - उसके अनुग्रह के द्वारा.