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devotions
निराशा और बेदारी

जैसे हिरणी जल के सोतों के लिये प्यासी हैं, वैसे ही मेरा दिल तेरे लिये प्यासा है हे परमेश्वर। (भजन संहिता ४२:१)

कर्इ वर्ष पहले, मेरा इन्टरव्यु एक मसीह रेडियो प्रोग्राम के द्वारा लिया गया, और उन्हों ने मुझे एक प्रश्न पूछा, ßरोमियों की कलीसिया और अमेरिका की कलीसिया में सबसे बड़ा अन्तर क्या हैं ?ß उस समय बहुत अन्तर था। उस समय कामरेडों के अन्धकारमय दिन थे और दुष्ट तानाशाह नकोले किआसू था। मसीह लोगों को सताया जा रहा था। लोग अपनी नौकरी अपने विश्वास के कारण खो रहे थे। कुछ लोग मुकितदाता के प्रति अपने प्रेम के कारण कैद में भी चले गये थे। यह बहुत ही कठिन था। किआसू के अजेंटो ने बाइबल को बड़ी मात्रा में देश में आते हुए ढूंढ़ लिया था, और उन्हों ने बाइबल को टायलैट पेपर बना दिया था। पर यह न सिर्फ आतिमक परेशानी थी। लोग शारीरक परेशानियों का भी सामना कर रहे थे। बहुत सारे लोगों को रोटी प्राप्त करने के लिये घण्टों तक खड़े रहना पड़ता था। अक्सर ही खरीदने के लिये कुछ भी नहीं होता था। देश में बहुत ही कम सीटें थी। फिर भी इन सब परेशानियों के बावजूद, बहुत सारे चर्चों में लोगों के बैठने की जगह नहीं थी। मसीह लोग सुबह ही आराधना सभा में प्रार्थना करने और परमेश्वर को खोजने के लिये आते थे। यह परमेश्वर के लोगों के लिये एक बहुत ही असाधारण समय था।

तो फिर मैंने इस प्रश्न का उतर कैसे दिया ? मैंने अमेरिका की कलीसिया और रोमियों की कलीसिया के अन्तर के बारे में सोचा और मैं एक नतीजे पर पहुंचा। सब से बड़ा उतर इन दो झुण्डों के लोगों के बीच अमेरिका की सुंदर कलीसिया की सुविधाओं या रोमियों के बीच सुंदर चचोर्ं की कमी नहीं थी। यह अमेरिका के लोगों के बीच सताव की कमी और रोमियों के मसीह लोगों का सताव नहीं था। सब से बड़ा अन्तर जो रोमियों की कलीसिया और अमेरिका की कलीसिया के बीच था, वह कि रोमियों के लोग जरूरतमंद लोग थे, और उन्हें इस बात का पता था व अमेरिका के लोग भी जरूरतमंद थे, पर उन्हें इस बात का पता नहीं था

रोमियों के विश्वासी यह जानते थे कि उन को परमेश्वर की जरूरत हैं। वह उसके लिये तड़प रहे थे। केवल वह ही उन की एकमात्र उम्मीद था। उनके पास मसीही किताबों की दुकानें नहीं थी। उन लोगों के पास मसीही टेलीविजन या रेडियो नहीं था, पर उन के पास कुछ था जिस की पशिचम के लोगों को बहुत ज्यादा जरूरत हैं और वह यह कि उनके पास दिल था। जो कि, वे परमेश्वर को ढंूढ़ रहे थे। उन के अन्दर उसको जानने की व उसकी आज्ञाओं को मानने की चाहत थी। वह उस हिरणी के समान थे, जो जल के सोतों को खोज रही हैं। छोटे शब्दों में वह खोज रहे थे और उनकी खोज ने उनको मजबूर किया किया वे पूरी तरह से परमेश्वर पर विशवास करें।

यह खोज उनको परमेश्वर की तरफ मोड़ लार्इ। उस ने उनकी प्रार्थना को सुनकर उन्हें उतर दिया। परमेश्वर ऐसे मनवालों को ढंूढ़ता हैंं। मैं इस बात के प्रति कायल हूं कि मसीही लोगों ने अपनी गंदी आदतो पर जीत इसलिए नहीं पार्इ हैं, क्योंकि वे परमेश्वर की जीत को खोज नहीं रहें है। बहुत सारी कलीसियाओं के बीच बेदारी इसलिए नहीं आर्इ क्योंकि वे अपनी सुस्ती में बहुत ही आराम महसूस कर रहे हैं। अक्सर ही मैंने यह पाया कि बहुत सारे विश्वासी जानते हैं कि हालात ऐसे नहीं होने चाहिए, जैसे के हैं। पर वे ढंूढ़ने के स्थान तक नहीं पहुंचे हैं। यह निराशा की वह जगह होती हैं जंहा हम परमेश्वर को पूरे दिल से खोजना शुरू कर देते हैं। जब हम उस को इस तरह से खोजते हैं, तो हम उसे पा भी लेते हैं। होशे (याजक) ने कहा (अपने लिये धर्म को बीजो) ßअगर आप अच्छार्इ बीजोगे तो आप सच्चे प्रेम की कटार्इ करोगे। अपनी बंजर भूमि को सींचो। यह परमेश्वर का इंतजार करने का समय हैं। वह आएगा और तुम पर अच्छार्इ का मेंह बरसाएगा।ß ( होशे

इसे बेदारी कहते हैं। यह जीत है। यह परमेश्वर लोगों को नया कर रहा है। यह परमेश्वर अपना प्रेम और दया हमें दिखा रहा है। क्या आप परमेश्वर का प्रेम और उसकी दया को ढूंढ रहे हैं ? अगर हां तो आपका मन भी बेदार हो जायेगा.